ईरान पर अमेरिकी हमले से खौफ में मुस्लिम दुनिया: सऊदी अरब, ओमान और कतर ने जताई चिंता

ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद मुस्लिम देशों में हड़कंप, कई देशों ने जताई गहरी चिंता

22 जून 2025 | janhitme.com

ईरान के फोर्डो, इस्फहान और नतंज जैसे संवेदनशील परमाणु ठिकानों पर अमेरिका के हमले के बाद पूरी मुस्लिम दुनिया में बेचैनी बढ़ गई है। इस कार्रवाई को लेकर कई मुस्लिम राष्ट्रों ने एक सुर में चिंता जताई है और क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडरा रहे ख़तरे को लेकर गहरी नाराज़गी ज़ाहिर की है।


मध्य पूर्व के बड़े देशों ने जताई प्रतिक्रिया

1. सऊदी अरब:
मध्य पूर्व की सबसे प्रभावशाली ताकतों में शामिल सऊदी अरब ने इस हमले को “क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा” बताया है। रियाद ने सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के माध्यम से हल निकालने की अपील की है।

2. ओमान:
ओमान ने बयान जारी कर कहा कि इस तरह की सैन्य कार्रवाई से पूरे क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। ओमान ने कहा कि वह हमेशा से मध्यस्थ की भूमिका में रहा है और शांति बनाए रखने के पक्ष में है।

3. कतर:
कतर ने इस हमले पर अफसोस जताते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं ईरान और अमेरिका के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बना सकती हैं। कतर ने संयुक्त राष्ट्र से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।


ईरान को समर्थन देने वाले अन्य मुस्लिम देश

  • तुर्की ने अमेरिका के कदम की आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया है।
  • लेबनान में हिज़्बुल्लाह ने ईरान के साथ एकजुटता प्रकट की है।
  • पाकिस्तान ने क्षेत्रीय शांति और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने की बात कही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी पर सवाल

मुस्लिम देशों के अलावा कुछ अन्य देश भी इस हमले को लेकर चिंतित हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी शक्तियों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। क्या वाकई यह हमला आत्मरक्षा में था या फिर यह एक रणनीतिक दबाव की कोशिश?


क्या होगा अगला कदम?

ईरान की ओर से भी यह संकेत मिल रहे हैं कि वह जवाबी कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह हमला पश्चिम एशिया में एक और बड़े युद्ध की शुरुआत तो नहीं?


निष्कर्ष:
फिलहाल यह साफ है कि अमेरिका के इस कदम ने मुस्लिम देशों में असुरक्षा और असंतोष की भावना को और गहरा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखा जाना बाकी है कि कूटनीति से इस आग को बुझाया जा सकता है या नहीं।


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